सबसे उत्तम और प्रभावी प्राकृतिक खाद

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अभी तक भारतवर्ष  में जितने प्रकार की भी जैविक खाद बनाने की प्रचलित प्रक्रियायें चल रही हैं, उसे देखें तो पद्मश्री सुभाष पालेकर द्वारा विकसित “जीवामृत” बनाने की प्रक्रिया ही सर्वाधिक प्रचलित है। इस प्रक्रिया के विषय में  मैंने अपने पिछले लेखों में भी बताया था I लेकिन, उसे एकबार पुनः दोहराते हैं।

200 लीटर के एक प्लास्टिक के ड्रम में लगभग 150 लीटर पानी भर लें I पानी ऐसा हो जिसमें आयोडीन न हो I इसके लिए कुएं, बोरिंग या चापाकल का पानी ही उपयुक्त होता है I क्योंकि, जितने भी वाटर सप्लाई के जल होते हैं उसमें आयोडीन मिलाया ही जाता है I पानी भरने के बाद इसमें 10 किलोग्राम देशी गाय का ताजा गोबर, 10 लीटर देशी गाय का गौमूत्र डाल दें I गोबर जितना ताजा हो तो बेहतर है, क्योंकि; ताजे गोबर में करोड़ों  जीवाणु होते हैं जो 4-5 दिन के बाद वायु या धूप के संपर्क में आने पर धीरे-धीरे मरने लगते हैं I अत: गोबर ताजा हो तो बेहतर है I परन्तु गौमूत्र नया पुराना कुछ भी चलेगा I इसके बाद इसमें  2 किलो किसी भी प्रकार के दलहन चना, मूंग, मसुर, उरद आदि का बेसन डाल दें और  2 किलो गुड़ को पानी में रात भर घोल बनाकर रखने के बाद ठीक से मिलाकर डाल दें I गुड जितना पुराना हो उतना अच्छा है I आमतौर पर पंसारी के दुकानों में कुछ सड़ा या पिघला हुआ सा गुड़ मिल जाता है, जिसका प्रयोग आमतौर पर खाने में नहीं होता है I लेकिन, जानवरों को खिलाने के लिए लोग इसे सस्ते दामों में खरीद कर ले जाते हैं I यही गुड़ जीवामृत के लिए ज्यादा उपयुक्त माना गया है I अब गाय का गोबर, गौमूत्र, बेसन और गुड़ के पानी में डालने के बाद एक या दो किलो ऐसी भूमि का मिटटी डालें, जिनपर कभी भी रसायनिक खादों का प्रयोग नहीं हुआ है I इसमें किसी बरगद, पीपल, बांसबाड़ी आदि की मिट्टी  डाल दें I सबसे बढ़िया बरगद के नीचे की मिटटी मानी जाती है I क्योंकि, बरगद का वृक्ष 24 घंटे साँस के रूप में वायुमंडल से कार्बन- डाइक्साइड लेता है और उसे शुद्ध करके आक्सीजन में बदल कर उत्सर्जित करते रहता है I इसकी वजह से बरगद की छाया में हर तरह के जीवाणु बहुत ही आनंद से रहते हैं क्योंकि, चौबीसों   घंटे आक्सीजन मिलने के कारण इनका स्वास्थ भी ठीक रहता हैI अत: आप बरगद के नीचे की जो मिटटी उठाते हैं उसमें करोड़ो की संख्या में स्वस्थ जीवाणु भी चले जाते हैं I एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि मिट्टी कहीं भी से उठायें, जमीन को साफ कर लें और सतह से 4-6 इंच तक नीचे की ही मिट्टी लें I क्योंकि, 6 इंच के नीचे जीवाणुओं की संख्या कम हो जाती है I

अब आपने जब इन सभी चीजों को ड्रम में डाल दिया और बाकी का ड्रम पानी से भर दें। अब इस ड्रम में भरे हुए तरल पदार्थो को एक छड़ी या बांस के डंडे से घड़ी की सुई की सीधी दिशा में पांच मिनट या तब तक चलायें जब तक कि सभी पदार्थ पूरी तरह से आपस में घुलमिल न जाये I यह कार्य प्रतिदिन सुबह, दोपहर और शाम को करीब पांच-पांच मिनट करें। चलाते वक्त यह ध्यान रखें कि आप छड़ी या डंडें को इस प्रकार चलायें जैसे कि घड़ी की सुई चलती हैं, यानि बाएं से दाहिनी तरफ I क्योंकि उल्टा चलाने से जीवाणुओं के मरने का डर रहता है I अच्छी तरह चलाने के बाद आप इस ड्रम को किसी गमछे या धोती या पतली सूती  साड़ी से बांध दें ताकि हवा तो अन्दर बाहर होती रहे किन्तु, कोई कीड़ा-मकोड़ा अन्दर न जाने पाये I अब अगले चार या पांच दिन तक इस ड्रम के अन्दर के तरल पदार्थ को घड़ी की सुई की दिशा में सुबह-दोपहर-शाम तीन बार पांच-पांच मिनट के लिए चलायें और चलाने के बाद हर बार फिर एक पतला कपड़ा बांध दें I एक बात यह ध्यान रखनी चाहिए कि ड्रम को हमेशा छाया में ही रखें क्योंकि सीधी धूप पड़ने पर जीवाणुओं के मरने का खतरा बना रहता है I पांच दिन के बाद यह एक सशक्त खाद के रूप में तैयार हो जायेगा जिसमें असंख्य मित्र जीवाणु तो होंगे ही नाइट्रोजन, फास्फेट, पोटाश, जिंक, कैल्शियम आदि की भी भरपूर मात्रा रहेगी I अब आप इस तरल पदार्थ को जिसे “जीवामृत” का नाम दिया है, पानी में मिलाकर एक एकड़ खेत में महीने में एक बार डाल दें तो पूरे खेत की मिट्टी इतनी सशक्त हो जायेगी कि किसी भी अन्य प्रकार के खाद की आवश्यकता नहीं होगी I ऐसा ही डॉ. सुभाष पालेकर का दावा है और उनकी  पद्धति का अनुसरण करने वाले सैकड़ों किसानों ने अपने खेतों में प्रयोग करके इस दावे को सही भी पाया है I यदि  आप मशीन से स्प्रे करना चाहते हैं तो इसे अच्छी तरह किसी पतले कपड़े से छान लेना ठीक होगा, ताकि स्प्रेयर के पाईप में गोबर, बेसन या मिटटी का कोई कण फंस न जाएI 15 लीटर के स्प्रेयर टैंक में 10 प्रतिशत यानि डेढ़ लीटर जीवामृत स्प्रे करना पर्याप्त माना गया है I इस पद्धति का लाभ देश के हजारों जैविक किसान आज के दिन उठा रहे हैं I

जीवामृत” से भी ज्यादा प्रभावी है “गौकृपा अमृत

अहमदाबाद, गुजरात में एक गीर गायों की एक प्रसिद्ध गौशाला  है जिसका नाम  है “बंशी गीर गौशाला” । इसके संचालक श्रीमान गोपाल जी भाई सुतारिया हैं। ये महान गौभक्त है और गौ सेवा के साथ-साथ गौमाता का देश के कृषि क्षेत्र में और  किसानों के आर्थिक स्थिति के सुधार में क्या-क्या उपयोग हो सकता है, इसी  शोध में बरसों से लगे हैं। गोपाल जी भाई ने गुजरात के विभिन्न कृषि  वैज्ञानिकों की सहायता के गाय के गोबर और गौमूत्र में विद्यमान हजारों जीवाणुओं और बैक्टिरिया का अध्ययन कर कृषि  के लिए सर्वोत्कृष्ट उपयोगी बैक्टिरिया को चिन्हित करके उन्हें अलग करने का कार्य किया। वैसे तो गोबर और गौमूत्र में पांच हजार एक सौ से ज्यादा बैक्टिरिया हैं, ऐसा विभिन्न अनुसंधानों में पहले ही सिद्ध हो चुका है। किन्तु, गोपाल जी भाई ने लगभग 60 से 70 ऐसे अत्यंत प्रभावशाली बैक्टिरिया का चयन किया और इनका विस्तार गुड़ के पानी और देसी  गाय की दही को बिलोकर निकाले गये मठ्ठा (छाछ) के द्वारा किया। जब मैंने “गौकृपा अमृत” पर कई  विडीयो देखें तब मैंने गोपाल जी भाई सुतारिया से  टेलीफोन पर बात की। लम्बी बातचीत के बाद मुझे लगा कि यह वास्तव में एक नया क्रन्तिकारी अविष्कार है I तब मैंने अपने प्रतिनिधि को अहमदाबाद भेजकर कुछ लीटर गौकृपा अमृत मंगवाये। गौकृपा अमृत गोपाल जी भाई  मुफ्त में ही बांटते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा किसानों को इसका लाभ हो। उनका कहना है कि यह अविष्कार चूँकि, गौ माता की प्रेरणा एवं कृपा से हुआ है I अत: इसको बेचना बिलकुल नहीं है। जिसे चाहे वह हमारे यहां से मु्फ्त में ले जाये, लेकिन, शर्त  यही है कि यदि उससे और कोई मांग करता है तो वह भी उसे मुफ्त में ही दें। इसकी खरीद बिक्री न करें। यह कहना सही है कि जो व्यक्ति अपना लाखों रूपया खर्च करके कोई अविष्कार करता हो और उस अविष्कार से प्राप्त सामग्री को लाखों लोगों को मुफ्त में बांट रहा हो, तो उनका कहना उचित ही है कि कोई गौ कृपा अमृत को पैसे लेकर न दिया करे । लेकिन, अहमदाबाद से गौकृपा अमृत बिहार लाने में दिक्कत तो होती ही है। लाने में उसके पात्र का ढक्कन को खोलकर रखना होता है या पतला कपड़ा बांध कर रखना होता है, ताकि उस पात्र में हवा का आवागमन होता रहे जिससे जीवाणुओं का स्वास्थ्य बना रहे। हवा का आवागमन नही होने से जीवाणुओं के मरने का डर बना रहता है। अतः गौकृपा अमृत को हवाई जहाज या ट्रेन में तो लाया नहीं जा सकता था इसलिए गाड़ी में लाना पड़ा। वह भी इस तरह कि गाड़ी में कोई व्यक्ति उसे पकड़ कर बैठा  रहे ताकि छलक न जाय। गाडी भी सावधान से चलाना पड़ता है।

“गौकृपा अमृत” के विस्तार का फार्मूला भी अतिसरल है।  200 लीटर के प्लास्टिक के ड्रम में 2 किलो गुड़ का पानी और 2 किलो देसी गाय की दही से बिलौना से बनाये गये मट्ठा (छांछ) और एक लीटर गौकृपा अमृत का मदर कल्चर डाल दें, और उसे चार-पांच दिन तक सुबह-दोपहर-शाम किसी लकड़ी या डंडे से चलाते रहे । पांचवें दिन “गौकृपा अमृत” का 200 लीटर मदर कल्चर तैयार हो जायेगा। इसका भी प्रयोग आप उसी प्रकार कर सकते हैं जैसा कि ऊपर जीवामृत का प्रयोग बताया गया है। किन्तु, इसका प्रभाव कुछ ज्यादा है। क्योंकि वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध किया हुआ लगभग आधा दर्जन बैक्टिरिया इसमें नाइट्रोजन के लिए उतना ही फासफोरस,पोटाश के लिए और लगभग एक दर्जन ऐसे बैक्टिरिया है जो वायुमंडल में उपस्थित माइक्रोन्यूत्रियेंट अन्य तत्वों को ग्रहण कर पौधों को पहुंचाते हैं। इसके अतिरिक्त आधा दर्जन बैक्टिरिया ऐसे हैं जो जड़ों के आसपास फॅफूंद (फंगस) नहीं आने देते हैं और इससे पौधे की फफूंद नाशक क्षमता बढ़ती है।

गोपाल जी भाई सुतारिया का एक आग्रह रहता है कि आप जो भी खाद या ग्रोथ प्रमोटर का प्रयोग वर्तमान समय में करते हैं, उसे करते रहें। लेकिन, गौकृपा अमृत का प्रयोग अपने खेत के एक छोटे से भाग में करें और इसका रिजल्ट स्वयं देखें। मैंने भी ऐसा ही किया। जीवामृत का प्रयोग करता रहा और अपने फार्म के एक भाग में गौ कृपा अमृत का प्रयोग किया।

जीवामृत और गौकृपा अमृत में फर्क

लगभग एक महीने के प्रयोग के बाद मैंने देखा कि जिस भाग में गौकृपा अमृत का प्रयोग किया, उसकी बढ़वार बेहतर है। पौधों  में कल्ले (टहनियां) भी ज्यादा निकल रहे हैं। फूल भी बेहतर आ रहे है और फल भी ज्यादा बढ़ रहे हैं।

इसी बीच हमारे यहाँ मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में एक पारम्परिक कृषि वैज्ञानिक श्री ताराचन्द बेलजी का आगमन हुआ जिन्होंने भारत रत्न नानाजी देशमुख के साथ प्राकृतिक कृषि का कार्य शुरू किया था I जब हम खेतों में घूम रहे थे तो मैंने श्रीमान बेलजी जी से पूछा कि इस खेत में तरफ तो जीवामृत का प्रयोग हुआ है और दूसरे तरफ गौ कृपा अमृत का प्रयोग किया गया है I लेकिन, गौ कृपा अमृत के प्रयोग का रिजल्ट बेहतर कैसे है? वे हँसने लगे और उन्होंने कहा कि आप अभी एक गिलास जीवामृत और एक गिलास गौकृपा अमृत मंगवाएंI इसका उत्तर मिल जायेगा I मैंने वैसा ही किया I जब दोनों मेरे पास आ गए तो उन्होंने कहा की इसे बारी-बारी से अपने नाक से सूंघिये I जब मैंने ऐसा किया तो जीवामृत में दुर्गन्ध था और गौ कृपा अमृत में बहुत ही सौंधी सी खुशबु थी Iतब तारा चंद बेलजी जी न कहा कि यह दुर्गन्ध ही आपके प्रश्न का उत्तर है I जैसे हम मनुष्यों को दुर्गन्ध पसंद नहीं है उसी प्रकार पौधे भी दुर्गन्ध पसंद नहीं करते है I जीवामृत में बेसन है जिसके सड़ने से दुर्गन्ध पैदा होता है, जिससे इसका प्रभाव उतना अधिक नहीं होता है I गौकृपा अमृत में जीवाणुओं की वृद्धि के लिए छांछ (मठठा) और होता है, जिससे उसके जीवाणुओं का विस्तार अधिक होता है I इस प्रकार हमारा उद्देश्य तो जीवाणुओं का अधिकतम विस्तार करना और उनका  स्वास्थ्य वृद्धि और उसको ज्यादा ताकतवर बनाना है I उन्हें विस्तारित करने के लिये कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन प्रदान करना है तो इसके लिए हम दुर्गन्ध वाली  चीजों का प्रयोग ही क्यों करें I इसी प्रकार देसी गाय का मट्ठा (छांछ) और गुड़ के पानी का जब प्रयोग किया जाता है तो पौधे के जड़ों में ऐसे तमाम जीवाणु भी मिलेंगे जो जमीन और वातावरण से नाइट्रोजन, फास्फोरस पोटाश, सल्फर जिंक  सारे तत्व खींच कर देंगे और दुर्गन्ध में अभाव में ज्यादा बेहतर काम करेंगे I अत: किसान भाईयों को ज्यादा से ज्यादा गौ कृपा अमृत का प्रयोग करना चाहिए I मात्र एक लीटर कल्चर के साथ दो लीटर मठ्ठा और दो लीटर गुड का पानी चाहिए जिससे पांच दिनों में 200 लीटर गौकृपा अमृत का मदर कल्चर तैयार कर सकते हैं I इसमें न तो गौमूत्र और गोबर उठाने की जरूरत है और न किसी प्रकार के दुर्गन्ध का सवाल है I “हांथ कंगन के आरसी क्या? और पढ़े लिखे के लिए फारसी क्या? ”

अत: प्रयोग में जो अच्छा लगे वही कीजिये I

अगले अंक में हम गौ कृपा अमृत के कुछ अन्य गुणों का विशेष वर्णन करेंगे I

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