न जहर बोयेंगें, न काटेंगें, न खायेंगें न बेचेंगें- पर पारम्परिक खेती से करेंगें गांवों को स्वस्थ्य , सुखी और समृद्ध

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आखिर कैसे होंगें गॅांव सुखी और समृद्ध! कैसे होगी किसानों की आय दुगनी नहीं- चौगुनी? ये सवाल सुनते – सुनते कान तो पक गये, पर सही जवाब अबतक किसी ने दिया नहीं!

मैं एक औसत किसान परिवार में पैदा हुआ! परिवार अमीर तो नहीं था पर खाने- पीने की कमी नहीं थी। लेकिन, १९३४ की भयॅंकर बाढ और भूकम्प ने सबकुछ तहस – नहस कर दिया! घर सोनभद्र में समा गया! परिवार अपनी ही गौशाला में शरणार्थी बनकर रहने लगा!

दादों – परदादों ने शिक्षा तो प्राप्त की थी, पर कभी किसी की चाकरी नहीं की थी। लेकिन, मेरे पिताजी और उनके तीनों छोटे भाइयों को उच्च शिक्षा प्राप्तकर भी नौकरी के लिये गांव से बाहर निकलना पडा! घर में नौकरी की लत लग गई तो मेरे सभी भाईयों ने भी पिताजी की तरह अच्छी- खासी सरकारी नौकरियां पकडीं! लेकिन, मैं पत्रकारिता करता रहा और गांव से भी सम्बन्ध बनाये रखा! मेरे बाबा( दादाजी) ने जो सॅंघर्ष किया उसको बचपन से मैं देखता रहा, समझता रहा और उनका हाथ भी  बॅंटाता रहा। बाबा और फिर पिताजी के स्वर्गवासी होने के बाद जब मुझे खेती सॅंभालने की नौबत आई, वह एक तरह से मजबूरी ही थी। क्योंकि, परिवार में न तो किसी के पास समय था , न ही रुचि। तब मैनें गांव जाकर देखा कि सभी जहर ही बो रहे हैं और जहर ही काटकर बेच रहे हैं और खुद भी सपरिवार वही जहर खा भी रहे हैं! मुझे तुरॅंत पॅंजाब से मुंबई जाने वाले कैंसर एक्सप्रेस का रहस्य समझ में आ गया। वही बिहार से किसी तरह रोकना था।

मैंनें तो अपने बचपन में अपने बाबा को कभी खेतों मे रसायनिक उर्वरक डालते नहीं देखा था , जिसे वे जहर कहते थे, जो आज वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में सिद्ध भी हो चुका है! इसलिये मैं तो फिर से अपनी पारम्परिक खेती की ओर ही वापस चल पडा। गौ मूत्र और देसी गाय के गोबर तथा जितने भी वनस्पति अपने ही खेतों के आसपास उपलब्ध थे, उन्ही से उर्वरक भी तैयार किये, कीटनाशक भी और ग्रोथ प्रोमोटर भी! शुरु के तीन – चार वर्ष पैदावार कुछ कम जरूर थी, पर कोई नुकसान भी न था, क्येंकि , लागत भी कम ही थी! अब तो पैदावार भी ठीक- ठाक है और लागत भी कम है!

समस्या मार्केटिंग की जरूर थी! मैं अपनी जहरमुक्त पैदावार को सामान्य बाजार में बेचना अपने उत्पादों का अपमान समझता था। तो मैं अतिरिक्त उत्पादों को मित्रों में ही बॅाटने लगा! मेरी पुत्रवधू मार्केटिंग की एम०बी०ए० है और पोते – पोतियां भी स्कूल जाने वाले हो गये हैं! अत: बहूरानी ने एक कम्पनी बनाकर मार्केटिंग को व्यवस्थित कर दिया। आज हमारी बिलोई हुई देसी गायों की घी, लकडी के कोल्हू में बैलों/नन्दियों द्वारा पेरा हुआ तेल, ढेकी का कूटा हुआ चावल, जॅाता( हाथ चक्की) द्वारा पीसा हुआ आटा, बेसन , सत्तू, अपने खेतों मे उगाये मसाले विश्व भर में अच्छे दामों पर बिक रहे हैं और गॅावों में रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं, विशेषकर महिलाओं के लिये!

अब आईये, बात करें कि यह जहर मुक्त खेती है क्या? सीधे शब्दों में बात करें तो यह आपके बाप- दादों की पारम्परिक खेती  ही है और कुछ नहीं है। हां, यह जरूर है कि अब इसमें भी नये- नये प्रयोगें से उर्वरकों और कीटनाशकों को बनाने की आसान और ज्यादा प्रभावी विधियां विकसित हो गई हैं और लगातार होती जा रही हैं।

जब मैंनें कई वर्षो पूर्व महान गॅाधीवादी चिन्तक-विचारक और लेखक स्व० धर्मपाल जी की पुस्तक “ एग्रीकल्चर इन प्री ब्रिटिश इॅंडिया” में पढा था कि अॅंग्रेजों के आने के पूर्व जो खेती भारतवर्ष में  बिना किसी भी प्रकार के रसायनों के प्रयोग के होती थी वह आज के आधुनिक रसायन युक्त खेती से ढाई गुना ज्यादा पैदावार देती थी, तो मैं चकित रह गया था! भला यह कैसे सॅंभव होता होगा? लेकिन, जब पूरी जांच- पडताल करके मैं आश्वस्त हो गया कि अपने स्वभाव और कार्ययोजना के तहत किसी भी मार्क्सवादी या नेहरूवादी बुद्धिजीवी को तो छोड दें किसी रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक के पक्ष मे मोटी पारिष्रमिक लेकर ज्ञान बांटने वाले तथाकथित वैज्ञानिकों ने भी धर्मपाल जी की पुस्तक के किसी दावे का खॅंडन नही किया है, तब मैं उसी दिशा की ओर बढ चला।

पूरी पारम्परिक कृषि का आधार है देसी गायें और उनका गौबर और गौमूत्र! भारतीय उप- महाद्वीप में प्रचुरता से पाई जाने वाली गौ- माताओं और उनके बच्चों में एक खास चीज होती है कि उनके कंधे ऊॅंचे होते हैं या यूं कहें कि कॅंधों पर पुट्ठा उभरा रहता है और गले में झालर लटकी होती है, जैसे कि उसने माला पहन रखी हो! इसी उभरे पुट्ठे की शक्ति से भारत की देसी गौ मातायें चाहे वे गीर हों, साहिवाल हों, थारपारकर हों, राठी हों, कांकरेज हों , गॅंगातीरी हों या छोटी- छोटी पहाडी गायें हों या दक्षिण भारत की ही गौ मातायें क्यों न हों अपने इसी उभरे पुट्ठे से सूर्य की नीलाश्म रश्मियों को ग्रहण करने की अद्भुत क्षमता रखती हैं जिससे इनके मूत्र और दुग्ध में सुवर्ण की सूक्ष्म मात्रा आ जाती है, मूत्र में कैंसर तथा अनेक जानलेवा व्याधियों को रोकने और उपचार की क्षमता आ जाती है और गोबर में असॅंख्य जीवाणु आ जाते हैं जो पैदावार बढाने का कार्य करते हैं!

खेती करता कौन है?

पूरे विश्व में यह भ्रम स्थापित हो गया है कि किसान भाई उन्नत बीजों, तरह- तरह के उर्वरकों , कीटनाशकों, माइक्रोन्यूट्रिएंट और ग्रोथ प्रोमोटरों की सहायता से कृंषि उत्पादन करते हैं! मैंने अपने जमीनी अनुभव और गहन अध्ययन और अनुसॅंधान के बाद यह पाया कि यह धारणा गलत ही नहीं, बल्कि; ठीक उलटी है! किसान भाई तो व्यवस्था के अतिरिक्त कुछ करते ही नहीं हैं!  उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक आदि जितना उत्पादन बढाते हैं उसका सौ गुना जमीन का नुकसान करते हैं। जमीन में पहले दिखने वाले केंचुये और सामान्य आंखों से नही दिखने वाले असॅंख्य जीवाणु गायब कैसे होते जा रहे हैं, इसपर जरा विचार कीजिये।

हो यह रहा है कि अॅंधाधुंध रसायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग से इनमें से ज्यादातर तो मर जाते हैं और जो बच भी जाते हैं वे धरती की निचली सतह में १० से २० फुट नीचे जाकर अपनी प्राण रक्षा के लिये बैठ जाते हैं।

 

                                            (आर. के सिन्हा)

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